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धर्म (५) सनातन धर्म की संस्कृति

 


क्या है सनातन धर्म का अर्थ??



सनातन शब्द का अर्थ इतिहास में अलग अलग मिलते हैं
कुछ विद्वानों की मान्यता है कि सनातन शब्द का अर्थ 
निराकार रूप है जिसका ना आदि है ना अन्त जिसमें पूरा 
ब्रह्माण्ड इसमें समाहित है।
] सनातन धर्म मूलत: भारतीय धर्म है, जो किसी ज़माने में पूरे वृहत्तर भारत (भारतीय उपमहाद्वीप) तक व्याप्त रहा है। विभिन्न कारणों से हुए भारी धर्मान्तरण के बाद भी विश्व के इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी इसी धर्म में आस्था रखती है। सिन्धु नदी के पार के वासियो को ईरानवासी हिन्दू कहते, जो 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे। उनकी देखा-देखी अरब हमलावर भी तत्कालीन भारतवासियों को हिन्दू और उनके धर्म को हिन्दू धर्म कहने लगे। भारत के अपने साहित्य में हिन्दू शब्द कोई १००० वर्ष पूर्व ही मिलता है, उसके पहले नहीं। हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था। 
पर अगर हम अपने मत से देखें तो हमें इसका एक अर्थ 
हमारे कर्मो से भी जुड़ा हुआ है जिसका जिक्र मै पिछले 
धर्म के भाग में कर चुका हूं।
क्यों कि हम अपने कर्म की व्याख्या या दूसरों के कर्मो 
को देख कर ये अनुमानित करते हैं कि ये सनातन हमारे 
कर्मो के आधार पर ही रखा गया है ।
वेदों में इसको मानने वाले को पांच भागों में बांट कर बताया गया है।
जो इस प्रकार है।
(१) गड़पत्ये श्री गणेश को मानने वाले
(२) शैवो देव अर्थात शिव को मानने वाले
(३) वैस्नो अर्थात विष्णु को मानने वाले
(४) सौर अर्थात सूर्य को मानने वाले
(५) शक्त अर्थात मां शक्ति को मानने वाले
ये सब उन शब्दों से निकला है को हमारे कर्मो से मिलता है 
गीता में भगवान ने कहा है जब संसार की रचना हुई तो सबसे पहले ओ शब्द ही हमें सुनाई दिए जिसको एक आकृति में रचना की और ओ पहला शब्द आम् यानि जिसको हम ऊं कहते है


ऊं से ही हमारे कर्मो की रचना ये हुई और इन सब से एक 
धर्म की उत्पत्ति हुई जिसे सनातन का नाम दिया गया 
इस प्रकार सनातन  से अनेक संप्रदायों की उत्पत्ति हुई जिसको उस समय के विद्वानों ने अपने अपने नाम से 
उसका प्रचार प्रसार किया 

सनातन से निकले हुए संप्रदाय 

हिन्दू , मुस्लिम, शिख़, ईसाई, जैन,पारसी, बौद्ध, ये सब सनातन धर्म से ही निकले हैं आपको पता होना चाहिए कि 
ये एक सामाजिक संप्रदाय है ना कि धर्म 
जो अपने गुरुओं के द्वारा रचना की गई ग्रंथो किताबों के बताए हुए मार्ग पर चलते हैं। और अपने कर्मो का पालन करते हैं।

अनेकों संप्रदाय में क्यों विभाजित
 हुए मनुष्य???

बहुत पहले हम एक पत्रिका में प्रकाशित कुछ अंस पढ़े थे
जिसमे लिखा था एक दार्शनिक जिसका नाम ट्राल्स टॉय था उसके अपने एक पुस्तक में इस वर्ण व्यवस्था के बारे में लिखा था  और वो पुस्तक हमारे देश में बैंड कर दिया गया क्यों कि राजाओं के खिलाफ शायद कुछ लिखा था
उस दार्शनिक ने एक उदाहरण दिया था कि अगर हम 
एक ही बेढ़े में गाय भैंस बकरी को रखते है तो कुछ दिन बाद वो आपस में ही लड़कर मर जाएंगे ।
उसी प्रकार अगर मनुष्य को एक ही संप्रदाय में समावेश 
कर दिया जाय तो उनका भी हाल इन जानवरों के जैसा होगा इस लिए पहले के विद्वानों ने इसको देखा परखा 
और अपने अपने हिसाब से विभाजित करते चले गए

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