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धर्म (३ ).....

धर्म के इस तीसरे भाग में आप सभी का स्वागत है
हमारी तरफ से ईश्वर से प्रार्थना है कि इस संकट की घड़ी में
आप सभी निरोग खुश रहें 
अगर हम आज कुछ समय अपने आप को ये समझ रहें हैं कि
हम इस लॉक डाउन में परेशान हैं तो आप सही सोच रहे हैं
लेकिन अगर आप अलग नजरिए से इस संसार को देखते हैं तो
आप को अपना कष्ट नजर ही नहीं आएगा
क्यों कि सोचने समझने की क्षमता ईश्वर ने सिर्फ हम इंसानों को ही दिया है
अगर सर्वे भवन्तु: की नजरों से देखते हैं तो प्रकृति आज अपने आप को सवार रही है  वो भी हमारे लिए क्यों कि आज तक हमने  उसका बहुत दोहन किया आज जब हम कोरोना की वजह से अपने सारे कामों को विराम दिया है तो ये कायनात 
अपने को हमें आगे और कुछ देने के लिए सवर रहीं हैं 
आज हम क्यों इतने परेशानि यो से घिरे हैं इसका एक मात्र कारण हमारा धर्म है ।
जिसको हमने ताक पर रखकर कर आगे जाने की कोशिश 
की पर सिकंदर बनकर भी आज मुंह की खा गए 
और आज कोई बादशाहीयत हमारे काम नहीं आ रही है
आज कोई भी धरम  जिसको हमने खुद बनकर उसकी टोपी पहन कर अपने आप को अनोखा बताने की कोशिश कर रहे हैं
वो आज कुछ काम नहीं आ रही है जानते हैं क्यों 
क्यों की हम में मैपन का मुकुट जो पहन रखी है
अगर हमने एक एक घर बनाया तो उसपर अपना नाम दर्ज कर ली कि ए मेरा घर है गाड़ी लिया तो ये मेरी गाड़ी है बच्चे 
पैदा किए तो ये मेरा बच्चा है अगर हमने जाति चुनी तो ये मेरी
जाति है।
हमने इस संसार में अपने सारे कामों में मै लगा दिया पर क्या कभी सोचा  जिसने ओ सारी वस्तुओं को दिया जिस पर अपना अधिकार जमाए बैठे है उसे क्या दिया हमने 
अगर हम ये सोच रहे है की हमने मंदिर , मस्जिद , चर्च, गुरद्वारों  का निर्माण कर के उनको याद किया प्रार्थना किया तो
ये हमारी बहुत बड़ी भूल है क्यों कि जो भी आज तक किया 
ओ सिर्फ अपने फायदे के लिए ही किया अगर मंदिर में पूजा किया तो अपने लिए मस्जिद में नमाज अदा की तो सिर्फ
अपने लिए 
आप अगर इस खाली वक्त में इन सभी बातों पर चिंतन करें तो
 आपको सारी बातें अपने आप ही समझ में आ जाएंगी
अब सवाल उठता है कि जब हमने कुछ किया नहीं तो 
ये संसार कैसे चल रहा है  ?
जहां तक मेरा अनुमान है कि हर किसी का एक समय होता है
अपने मंजिल तक पहुंचने का शायद इस पृथ्वी का भी समय निर्धारित है 
जिसका अनुमान हम अपने धर्म ग्रंथो से ही लगा सकते हैं ।
और जिसे हम बहुत पीछे छोड़ दिया है।
आज भारत की जनसंख्या १३० करोड़ है तो १३० में शायद 
३० लाख को ही अपने कर्म , धर्म, और ग्रंथ के बारे में 
मालूम होगा शायद ए भी संख्या 
 मै ज्यादा बोल रहा हूं 
सच बात ये है मुझे भी नहीं मालूम 
क्यों कि उन समाज वादो ने हमें ऐसे बाट दिया 
कि हमें इन सब बातों का इल्म ही नहीं रहा 
पर कुछ तो बात हम में थी कि एक छोटे से गांव में पैदा 
होकर भारत के सभी धर्मो से परिचित करा दिया 
इसका मोल भी हमें चुकाना पड़ा ।
कि जिस परिवार में पैदा हुआ उसे १२ साल की आयु में छोड़ना पड़ा परिवार ने जिस हमारी शादी जिस कन्या से १२ की उम्र में किया उसे भी छोड़ना पड़ा 
आज इन सब घटनाओं को लेकर असमंजस में पड़ जाता हूं कि किसकी हमारे प्रति इतना लगाव था कि हमें 
१७ साल बाद उसी दर पर जाना पड़ा 
जहां से हम १२ साल की आयु में त्याग आए थे
और जाने के बाद हमें ओ सारे रिश्ते  वैसे ही मिले 
जिसे हमने १७ साल पहले छोड़ गए थे चाहे ओ मां बाप भाई बहन या ओ लड़की हो जिसके साथ हमारी शादी हुई थी 
ये घटना ने हमें ये साबित कर दिया काल चाहे कोई भी हो 
जिसे हम कलयुग द्वापर , त्रेता , सतयुग कहते हैं 
अगर आपके अंदर सभी के प्रति आदर भाव त्याग , प्रतिपालन  हो तो हालात चाहे कैसे भी हो उसका प्रति फल मिलता जरूर है  बस हमें अपने कर्म को सही दिशा में करते चले जाना है ।
आप को ये सब बातें इस लिए बता रहा हूं 
क्यों कि ये सारी बातें उसी धर्म से जुड़ी हैं जिसकी हम आगे 
इस लेख में चर्चा करेंगे  
आज के लिए इतना ही आगे फिर आप सभी के सामने 
ये विजय ऐसे ही अपने मन की सारी बातें प्रस्तुत करेगा 
धन्यवाद,,,,,,,
गुलशन में अगर रहना है 
        कांटो से भी रिश्ते रखना होगा  
    





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