पाप और पुण्य (Sins and virtuous deeds)


Sins and virtuous deeds

परिचय (introduction)



पृथ्वी पर जब हम पैदा होते हैं तो हमें कुछ पता नहीं होता है
लेकिन जब हम बड़े होने लगते हैं हमें अपने भाषा , धर्म , कर्म
का ज्ञान होने लगता है और जिंदगी में जितने वर्ष हम जीते हैं 
उन्हें दो भागों में बांट दिया जाता है चाहे ओ कोई धर्म , पंथ 
संप्रदाय हो और ओ है पाप और पुण्य (Sins and virtuous deeds)

क्यों मनुष्य जीवन को पाप और पुण्य में बाट दी गई 

जब सृष्टि कि रचना हुई तब को भी मानव जाति पैदा हुई 
जिसे हम इतिहास में आदि मानव के नाम से जानते हैं।
जब आदि मानव ने अपने जीवन में ओ सारी ज्ञान को अर्जित किया जिनसे उनका जीवन आगे अग्रसर हो सके । और  उन ज्ञान को ओ पेड़ पौधे, जीव, परजीवियों से हासिल किया 
जिसकी ईश्वर ने रचना की। अगर आप आज बड़े आसानी 
से कोई भी समान की रचना , या भोजन पका के खाते हैं
तो उसको ढूंढने में सैकड़ों साल लगे है फिर उनको एक नाम 
देने में भी कई सालो का समय लगा है।
फिर ये सब होने के बाद ओ आदि मानव में जैसे जैसे बुद्धि 
का विकास हुआ उनको जब ये बात समझ में आने लगा 
कि हमें ऐसा करने से ये कष्ट होता है तो उस कष्ट को दूर करने के लिए तरह, तरह के उपाय किए और जब ओ सफल 
हुए तो उसे आगे की पीढ़ी को बताने के लिए 
उन शब्दों को चुना जो उन्हें प्रकृति में उत्पन हुए तरंगों , आवाज़ों, जो अपने, कानों, से सुना उन्हें एक आकृति देने के लिए पत्तों पर लिखना प्रारम्भ किया ।
उन शब्दों को सुनने और उसको लिख कर पुस्तकों की रचना करने वाले को ज्ञानी आज की भाषा में अविस्कारी कहा गया 
Aap को पता होना चाहिए वो पहली ग्रंथ में जो भाषा का इस्तेमाल किया वो हमारी संस्कृति (sanskriti)
भाषा है और वो पहली रचना ऋद्य वेद हैं इस तरह 
दुनिया वो वो चार वेद मिले जो मानव जाति के जीवन 
या फिर इस संसार के चक्र को चलाने में बहुत महतत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इन चारो से अनेक पुस्तकों की 
रचना हुई जिसे हम उपनिषद् के नाम से जानते हैं
और इनकी प्रथम चरण जिस आकृति में रचना की गई 
उसको  संस्कृति भाषा का नाम दिया गया ।
यही कारण है कि हमारी सनातन संस्कृति ही हमारी 
सनातन धर्म बन कर दुनिया को एक नई पहचान दी
बाद में ये कई पंथो में विभाजित  हो गए और इन सब पंथों में 
मानव को दो भागों में उसके जीवन को विभाजित कर दिया गया ताकि मनुष्य को किस भाग से हानि और किस भाग 
से लाभ मिलता उस जीवन में उतार कर उसका परिणाम 
क्या मिला उसको दो भागों में विभाजित कर 
पाप और पुण्य का नाम दे दिया गया। और ये पाप और पुण्य
ने उन काल चक्रों को जन्म दिया जिसे हम युग के नाम से जानते हैं ।
तीन युग हमारा एक ही धर्म पर चला और जब कलयुग का युग आया तो इस युग में अनेक पंथ में बदल गए और ए पंथ के ज्ञानियों ने जिसे हम गुरु  के नाम से जानते हैं उन लोगों ने 
इस मानव जीवन को चलाने के लिए इन दो ही बातों 
का महत्व अपने पुस्तक में उलेख किया है जो हमारे जीवन को 
मृत्यु तक का सफर करता है और फिर हम इस दुनियां से विदा होजाते हैं और हम उन कर्मो को छोड़ जाते हैं जिसे आने वाली पीढ़ी उन पाप और पुण्य के आधार पर निर्णय कर अपने 
जीवन में उतारती है। यही कारण है 
हमारा जीवन दो भागो पाप और पुण्य में विभाजित बाट 
दिया गया और इस पाप और पुण्य के क्रिया को कई तरह 
से इतिहास में दरसाया गया है। जो कथा ,कहानियों और 
गीत, गजलों, में हमें देखने सुनने को मिलता है।

क्या पाप और पुण्य प्रकृति में व्याप्त उन जीव, जंतुओं, पेड़,पवोधों भी इस नियम का पालन करते हैं??????


पाप और पुण्य का के नियम का पालन पेड़, जीव ,जंतु 
करते या इन्हे भी इन दो भागों में बांट दिए गए हैं ये बात 
हम पूरे विश्वास के साथ नहीं कह सकते क्यों की 
हम इसके बारे में ज्यादा जानते नहीं हैं ।
पर उन कहानियों किस्सों में इनका वर्णन इस पाप और पुण्य
के आधार पर ही देखने और सुनने को मिलता है ।
अगर इन बातों को दूर रख कर अपने मन से इस प्रकृति 
संरचनाओं को अपने अंदर महसूस करते है तो ये जरूर 
महसूस होता है कि इनका संबंध हमारे जीवन से कहीं ना कहीं से जरूर जुड़ा। होता है और अगर जुड़ा है तो 
पाप और पुण्य के भागी दार कहीं ना कहीं ये जरूर हैं 
क्यों की ईश्वर ने जिस किसी की की रचना की है उसकी 
कोई ना कोई वजह जरूर होता है कोई हमे फल देता है कोई 
दूध कोई कोई मांस आदि जिसका उपयोग हम अपने धर्म के आधार अपने जीवन में करते हैं। और वो हमें उस रूप में 
हमारी सेवा करने के लिए क्यों आ गया इसका प्रमाण 
हमें अपने उस कर्म को दरशता जो हम पाप और पुण्य को आधार मान कर चलते हैं । और पूर्व जन्म से संबंधित 
होता है । जो हमारे ग्रंथो में पूर्व जन्म की व्याख्या की गई है
बस हम में और इनमें फर्क इतना है कि ये प्रकृति के नियमो 
जिसने इसे संसार की  उत्पत्ति की उस परमात्मा के अनुसार चलते हैं और हम इनके अनुसार क्यों की हमें जो भी 
आज ज्ञान का भंडार है वो इसप्रकृति की ही देन है और
जब जब हमने इस प्रकृति को हानि पहुंचने की कोशिश की है
तब तब उसको बचाने के लिए ईश्वर ने पुनः उसकी संरचना 
की और बचाया है जिसका वर्णन हमारे 
धार्मिक ग्रंथो में है ।

धर्म में पाप पुण्य का महत्व ।।।।




आज हम अगर अपने धर्म का ज्ञान नहीं जान रहे हैं तो इसके लिए हमें कोशिश करना होगा ।
अगर आज हम इतने परेशानियों का सामना कर रहे हैं 
तो इसका कारण हमें ना तो अपने आप को जाना , ना 
ही अपने कर्म, धर्म को जाना आज जो कुछ हो रहा है 
ओ हमारा अपने से दूर रहना है क्यों कि 
हम आज भी इस प्रकृति के रहस्यों का ज्ञान नहीं है।
हम चाहें जितना भी अपने आप को सुपर पावर समझें
कुदरत के मार के आगे शून्य है ।
आज जितने भी पंथ हैं सभी अपने अपने को अच्छा साबित 
करने पर तुले हैं। और अपनी जमात, मंडली एक दूसरे 
से बड़ा करने का प्रसार, प्रचार में लगे हैं ।
पर इन्हे सभी वस्तुओं का ज्ञान होते हुए भी उस भौतिक 
सुखो में मग्न हैं।
जो बस कुछ चरण तक सीमित है। और हमारे आंखो 
के आगे एक धर्म के नाम का पर्दा डालकर उन प्रकृति 
का और हमारा शोषण कर रहें हैं 
आप को पता हो कि इस दुनियां में धर्म को चलाने वाले 
सवा करोड़ ठेकेदार हैं  भारत वर्ष में ज्योतिष शास्त्र 
को जानने के लिए १० लाख पंडित हैं को प्राकृतिक 
के पूर्व अनुमान का पता बताते हैं कि भविष्य 
में क्या होने वाला है ।
विज्ञान ने हमारी एक से बढ़कर एक अविस्करो को जन्म दिया है पर आज जब प्रकृति का  मार हमारे उपर कभी बीमारी
भूकंप, आकाशीय, मार , जल तांडव के रूप में आ रही है
तब हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं। 
उनके आगे हमारी खुद की बनाई हुई आविष्कार कुछ काम नहीं आ रही है, कोई धर्म , ज्योतिष आज विफल है ।
जानते हैं क्यों क्यों की हम अपनी भौतिक सुखों 
उन रिश्तों में ऐसे उलझ गए हैं कि उस प्रकृति से रिश्ता 
हम तोड़ते चले जा रहे हैं।
इन सब से बचने के लिए हमें अपने उस सनातन संस्कृति को 
पहचाना होगा और उसमे हमें वापस उस पाप और पुण्य
के मानवता रूपी कर्म को अपनाना होगा 
यही सत्य हैं ।







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