China and India



क्यों होता है चीन। और भारत में तनाव ???




भारत में जब भी विकास के लिए कोई  रूप रेखा तैयार किया जाता है सेना और जनता के लिए बार्डर पर कोई सड़क या हवाई पट्टी बनाई। जाति है चीन उनका अंदर ही अंदर विरोध 
करने लगता है और अपने झूठे पन से भारत को अपना हिस्सा 
बता कर दुनियां का ध्यान अपनी तरफ खींच कर ये साबित कर ना चाहता है कि पूरे वर्ल्ड में अपना ही राज्य है ।
चीन की ताना  शाही शासन अपने देश के जनता के साथ 
जो धोखा देती आ रही है उसी तरह बार्डर पर भारत के साथ 
भी धोखा देते आ रही है।
भारत ही नहीं वियतनाम , ताइवान , हांगकांग , ऐसे कई देश है 
जिसको चीन  अपने देश में मिलाने की कोशिश कर उनपर अपना 
संविधान थोपने की हर समय कोशिश करता रहता है ।
आज चीन हर चीज को बनकर भारत जैसे कई देशों को 
उनके दैनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाले अस्सी प्रतिशत
सामानों का निर्यात कर अपने ऊपर निर्भर कर हर समय 
अपना हक और अपने सैनिकों के दम पर धमकियां देता रहता है ।
भारत और चीन के तनाव आज से नहीं  सदियों से चली आ रही है।
महात्मा बुद्ध के समय में जब तिब्बत के लोग उनके अनुयाई 
तब भी चीन के राजाओं से तनाव हुआ था बाद में 
चीन के शासक और लोग भी  महात्मा बुद्ध के अनुयाई हो गए 
१८ वी सदी में भी जब द्वितीय विश्व युद्ध हुआ था तो चीन दो हिस्सों में बट गया था एक वो जो किसी धर्म को अपना आधार मानता था और दूसरा किसी धर्म पर विश्वास नहीं करता था 
आज वियतनाम , ताइवान, हांग कांग, ऐसे कई देश पहले चीन का ही हिस्सा थे बाद में वो चीन की गुलामी से आजाद हो गए।
बाद में चीन  तिब्बत के शासकों , और वहां के लोगों को अपना गुलाम बना कर पूरे तिब्बत को अपने कब्जे में ले लिया 
और जो भी विरोध करना चाहा उनका दमन कर दिया 
इसी तरह भारत पर भी वो नजर गड़ाए हुए है 
जब भी भारत अपने विकास के रास्ते पर आगे बढ़ने की कोशिश करता है चीन कुछ ना कुछ अड़ंगा लगता रहता है ।
आज जबकि भारत के बाजार में चीन का अस्सी प्रतिशत कब्जा है जब सरकार आत्मनिर्भर बनने की सोचता है तो चीन 
बार्डर पर भारत के साथ कुछ ना कुछ तनाव पैदा कर अपने ऊपर ध्यान खींचने की कोशिश कर रहता है ।
भारत और चीन के सरहद पर कुछ मसले सन १९६५ के युद्ध से ही चले आ रहे हैं १९६५ का युद्ध भारत हारने कि वजह से 
चीन भारत के कई हिस्सों पर अपना दावा करता है ।
आज जब की युद्ध के ६५ साल हो चुके है चीन को भी पता
है पहले का भारत नहीं है पर अपने व्यापार से भारत को 
समय समय पर आजमाने की कोशिश करता रहता है ।
इन्हीं सब कारणों से और तिब्बत के गुरू दलाईलामा को भारत में सरण देने के कारण चीन हमेशा भारत के साथ तनाव पैदा 
करता रहता है ।

भारत को क्या करना चाहिए ??

चीन और भारत के आपसी मतभेद का हल दोनों देशों को
आपस में ही सुलझा लेना चाहिए।
सरहद पर जो भी मसले हैं उनका हल सही तरीके से निकाल 
लेना ही आज के समय में बेहतर तरीका है क्यों कि आज का भारत लड़ाई , झगड़ों से दूर मिल जुल कर रहना चाहता है ।
अगर भारत आज चीन की तरह सोचता तो चीन का भारत के बाजार पर 80 प्रतिसत पकड़ नहीं रहता ।
भारत एक युद्ध इस लिए हारा क्यों कि आज़ादी के कुछ साल बाद ही चीन से युद्ध हुआ , भारत के उन पहाड़ी क्षेत्रों में सुविधाओं के अभाव के कारण और कुछ राजनेताओं के 
गलत निर्णय के कारण युद्ध हारा ।
अगर 1979 के वियतनाम जैसे देश चीन हार गया तो आज 
नए भारत से लोहा लेना उसको भारी पड़ेगा ।
अगर चीन  की मंशा युद्ध से ही हल करने की है तो 
भारत को सबसे पहले अपने आप को आत्मनिर्भर बनना 
होगा ।
लोगों में देश के प्रति समर्पण की भावना जगाना होगा ।
आपसी मतभेद भुला कर एक होना होगा ।
आज जो हम चीन का सामान अपने दैनिक जीवन में उपयोग 
कर रहे हैं। उन्हें धीरे धीरे अपने देश। के बने सामानों का उपयोग कर ना होगा ।
हमें कम में ही गुजरा करना सीखना होगा, तभी हमारे देश का 
विकास होगा ।
अगर थोड़ा सा सोच अपने देश  के लिए अपने दिल में रखें 
और चिंतन करें तो ये पाएंगे कि जब 80 प्रति सत भारतीय बाजार पर कब्जा कर चीन हमसे 100 रुपए में से 80
रुपए लेकर चला जाता है फिर भी भारत आज दुनियां के सिर्श 
देसो में खड़ा है । अगर हम वो 80 रुपए अपने देश को दे तो 
आज का भारत कहां से कहां पहुंच जाएगा ।
आज के भारत की एक कड़वी सच्चाई ये है कि 100 में 60 प्रतिसत आज के युवा देश के प्रति समर्पण की भावना से 
दूर रहते हैं उनमें मातृ भूमि की भावना कम होती है।
भारत देश को चाहिए की धर्म , की राजनीति को त्याग कर 
इन युवा पीढ़ी में अपने देश के प्रति जागरूक करना चाहिए।
ना कि आपस ने लड़ा कर सिर्फ घोटाला , और अपने पार्टी को 
आगे बढाने की सोचना चाहिए।
जब तक हम देश के प्रति समर्पण की भावना नहीं रखेंगे 
तब तक ऐसे ही चीन।,पाकिस्तान  जैसे देश हमें आखें दिखाते 
रहेंगे और हम उन सैनिकों के बलिदानों पर दो मिनट चुप रह कर और एक मोमबत्ती जलाकर अपने आप को एक देश भक्त 
साबित करते रहेंगे ।
आज हमे उन सैनिकों से सीख ना होगा जो अपने घर , मां बाप, भाई बहिन , बीबी, बच्चे को  छोड़ कर सरहद पर देश के
लिए डटे रहते हैं ।
उनसे कुछ सीख कर हम अपने देश के लिए इतना नहीं कर सकते कि अपने देश के बने समान का ही उपयोग करें ।
जिससे देश की अर्थ व्यवस्था प्रगतिशील हो ।
और हम किसी देश के आगे घुटने ना टेके ।
हमें ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं अपने ही विरोधी उस चीन से सीख लेना चाहिए जहां तानाशाही शासन होते हुए भी वहां के 95 प्रतिसत लोग देश के प्रति समर्पण की भावना रखते हैं।
हमारा देश तो प्रजातंत्र देश है फिर ऐसा क्यों ?
अगर हम इतिहास से सबक नहीं लिए तो ऐसा ना हो कि दुबारा इतिहास दोहराया जाए ।











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